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मैं सपने में रोटी खा रहा था?

वो इक्कीसवी शदी का भूखा ,
जन्मीं पे खिंचा उसने एक चौकोर घेरा ,
बोला देखो ये सुन्दर घर है मेरा ,
इसमें न छत है, ना दीवार है ,
फिर भी ये मजबूत है ,
यही इस बात का सबूत है
कि आंधी या तूफान इसे हिला नहीं सकते ,
वो धुप में वही सो गया,
दिन में ही खवाबों में खो गया,
जैसे ही वह नींद से जागा,
हमने उसपे सवाल दागा ,
भाई साहब जब आप सोये हुए थे
किन ख्यालों में खोये हुए थे
वो बोला मुझे बहुत मज़ा आ रहा था ,
मैं सपने में रोटी खा रहा था ,
और इतना खुश था , इतना खुश था;
ख़ुशी कि राह में गुजर गया ,
और ज़माने को पता भी नह चला ||

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Set Your Mood…तू किसी रेल सी गुज़रती है

तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
तू भले रत्ती भर ना सुनती हो
मैं तेरा नाम बुदबुदाता हूँ
किसी लम्बे सफर की रातों में
तुझे अलाव सा जलाता हूँ

काठ के ताले हैं, आँख पे डाले हैं
उनमें इशारों की चाबियाँ लगा
रात जो बाकी है, शाम से ताकी है
नीयत में थोड़ी खराबियाँ लगा
मैं हूँ पानी के बुलबुले जैसा
तुझे सोचूँ तो फूट जाता हूँ
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ

-Well known poet Dushyant Kumar