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क्या कहानी कहे पिछड़ने की

क्या कहानी कहे पिछड़ने की
उम्र थी तीतीलिया पकड़ने की
घर तो बसना था , बस गया लेकिन
एक कसक सी है कुछ उजड़ने की ,
अच्छी लगी थी , उन दिनों तालिब
दोस्ती में अदा बिगड़ने की- Anonymus

COPIED

 

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वायदे इश्क़

न आग जाने न हवा जाने ;
कब नशेमन जला , खुद जाने ;
जब से वायदे इश्क़ पी लीया;
न दर्द जाने , न दावा जाने ||–Anonymous.

Set Your Mood…तू किसी रेल सी गुज़रती है

तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
तू भले रत्ती भर ना सुनती हो
मैं तेरा नाम बुदबुदाता हूँ
किसी लम्बे सफर की रातों में
तुझे अलाव सा जलाता हूँ

काठ के ताले हैं, आँख पे डाले हैं
उनमें इशारों की चाबियाँ लगा
रात जो बाकी है, शाम से ताकी है
नीयत में थोड़ी खराबियाँ लगा
मैं हूँ पानी के बुलबुले जैसा
तुझे सोचूँ तो फूट जाता हूँ
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ

-Well known poet Dushyant Kumar