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फिर से तुम आ गए ।।

फिर से तुम आ गए ।।
मै चला जा रहा था , बेफिक्र सा
ना कोई मक़सद था न कोई मंजिल
ना कोई उम्मीद और न कोई महफ़िल
बस वक़्त था जो बदल रहा था
जिंदगी करवटें ले रही थी
ख्वाब अँगड़ाईंया ले रहे थे
नज़ारे धुंधली पड़ रही थी
साँसे थमती जा रही थी
जख्म उभरते जा रहे थे
यार बिछड़ते जा रहे थे
अँधेरा बढ़ता जा रहा था
दिन ढलता जा रहा था
रंग उड़ाते जा रहे थे
रूह पिघलती जा रही थी
ऐतबार टूटता जा रहा था
आंसू जमते जा रहे थे
इश्क भूलता जा रहा था
घर बिखरता जा रहा था
उम्र तरसती जा रही थी
प्यास सूखती जा रही थी
और फिर से तुम आये ।।

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क्या कहानी कहे पिछड़ने की

क्या कहानी कहे पिछड़ने की
उम्र थी तीतीलिया पकड़ने की
घर तो बसना था , बस गया लेकिन
एक कसक सी है कुछ उजड़ने की ,
अच्छी लगी थी , उन दिनों तालिब
दोस्ती में अदा बिगड़ने की- Anonymus

COPIED

 

जिद थी …

जमी पे सितारे सजाने की जिद थी
हमें उनको अपना बनाने की जिद थी
उन्हें कब थी फुर्सत सुने दिल की दास्तान मेरी
लेकिन हमें उनको सुनाने की जिद थी

….अरे सही वक़्त पे अक्ल आ गयी वरना
हमें खुद को उनपे मिटने की जिद थी

 

—–UNKNOWN