क्या कहानी कहे पिछड़ने की

क्या कहानी कहे पिछड़ने की
उम्र थी तीतीलिया पकड़ने की
घर तो बसना था , बस गया लेकिन
एक कसक सी है कुछ उजड़ने की ,
अच्छी लगी थी , उन दिनों तालिब
दोस्ती में अदा बिगड़ने की- Anonymus

COPIED

 

Advertisements

ख्वाहिशे …..

सुबह की वो ख्वाहिशे , शाम तक टाली हैं ||
कुछ इस तरह जिंदगी हमने संभाली हैं ||

जिद थी …

जमी पे सितारे सजाने की जिद थी
हमें उनको अपना बनाने की जिद थी
उन्हें कब थी फुर्सत सुने दिल की दास्तान मेरी
लेकिन हमें उनको सुनाने की जिद थी

….अरे सही वक़्त पे अक्ल आ गयी वरना
हमें खुद को उनपे मिटने की जिद थी

 

—–UNKNOWN

मैं सपने में रोटी खा रहा था?

वो इक्कीसवी शदी का भूखा ,
जन्मीं पे खिंचा उसने एक चौकोर घेरा ,
बोला देखो ये सुन्दर घर है मेरा ,
इसमें न छत है, ना दीवार है ,
फिर भी ये मजबूत है ,
यही इस बात का सबूत है
कि आंधी या तूफान इसे हिला नहीं सकते ,
वो धुप में वही सो गया,
दिन में ही खवाबों में खो गया,
जैसे ही वह नींद से जागा,
हमने उसपे सवाल दागा ,
भाई साहब जब आप सोये हुए थे
किन ख्यालों में खोये हुए थे
वो बोला मुझे बहुत मज़ा आ रहा था ,
मैं सपने में रोटी खा रहा था ,
और इतना खुश था , इतना खुश था;
ख़ुशी कि राह में गुजर गया ,
और ज़माने को पता भी नह चला ||

Image [http://images.fineartamerica.com/images-medium-large/beggers-childlife-toton-das.jpg]

वायदे इश्क़

न आग जाने न हवा जाने ;
कब नशेमन जला , खुद जाने ;
जब से वायदे इश्क़ पी लीया;
न दर्द जाने , न दावा जाने ||–Anonymous.

तमन्ना….

कुछ तो जीते है जन्नत की तमन्ना लेकर ,
और कुछ तमन्नाये जीना सीखा देती है|
हम किस तमन्ना के सहारे जिए ,
ये जिंदगी तो रोज़ एक तमन्ना बढ़ा देती है ||

Set Your Mood…तू किसी रेल सी गुज़रती है

तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
तू भले रत्ती भर ना सुनती हो
मैं तेरा नाम बुदबुदाता हूँ
किसी लम्बे सफर की रातों में
तुझे अलाव सा जलाता हूँ

काठ के ताले हैं, आँख पे डाले हैं
उनमें इशारों की चाबियाँ लगा
रात जो बाकी है, शाम से ताकी है
नीयत में थोड़ी खराबियाँ लगा
मैं हूँ पानी के बुलबुले जैसा
तुझे सोचूँ तो फूट जाता हूँ
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ

-Well known poet Dushyant Kumar

Dhananjay's Blog

%d bloggers like this: